रविवार, 6 दिसंबर 2009

राह सामने दो होगी
एक काँटों से भरि होगी
दूसरी चमकती रेत का दलदल होगी
समझके रह चुन्नी होगी
एक में काँटों से लहू लुहान पाव होगे
पर मंजिल तक पहुच जाऊगे
चमकती रेत दिल को बहुत लुभाए गी
पर पाव रखते ही मंजिल तो क्या मिलेगी
मौत के मुह में समां जाओगे
रह समझ कर चुनना
भले ही काँटों भरी ही सही
इमारते रोज गिरती है
फिर नई बन जाती है
वो इंसानी तामीर है
पर जिंदगी गिरती है
तो फिर बिखर जाती है
क्यों की वो खुदा की तामीर है